Tuesday, 29 January 2013

 आधी आबादी 


तुम जो कुछ कहना चाहती थी
अब वही देश का संविधान होगा
तुम जितना रोना चाहती थी
अब वही देश का इतिहास होगा
तुम जिन ज़ख्मों से हार गयी
अब वही देश का नक्शा होगा
और यह देश मेरा होगा
चाहे इसका नाम भारत हो
या न हो;

इस देश की आज़ादी का
कोई राष्ट्रीय इतिहास नहीं होगा
क्योंकि इससे एक ग़लतफ़हमी पैदा होती है
कि आज़ादी राष्ट्रीय चीज़ है
जिस चीज़ के लिए
आधी से ज़्यादा आबादी अपनी लड़ाई में
अनवरत, अकेली और बेबस है
वह न तो राष्ट्रीय होगी
और न ऐतिहासिक;

सिर्फ़ दिल्ली में नहीं
इस देश की हर गली में औरतें होंगी
लड़कियों के झुण्ड के झुण्ड होंगे
उनका अपना एक चेहरा होगा
जो माथे की बिंदी से बड़ा होगा
उनकी अपनी एक इज्ज़त होगी
जो मूछों पर बैठे लोकतंत्र से बड़ी होगी
उनका अपना एक सपना होगा
जो बेटे पैदा करने से कहीं बड़ा होगा;

इस देश में
कानून की किताबों
और एक लड़की के कपड़ों के वजन में फ़र्क होगा
और यह फ़र्क उतना ही बड़ा और पवित्र होगा
जितनी एक जवान लड़की की रात होती है;

इस देश के मर्दों को
औरत में औरत को ढूँढना आता होगा
और जिसकी नज़र कमज़ोर होगी
उसके गले से पट्टा मैं खोलूँगा
और मैं बताऊंगा
की इंसान बनने की कोशिश में
मैंने लाखों साल लगाए हैं
सिर्फ़ अपनी उम्र नहीं. . .
बस, अब और नहीं. . . !

(दिवंगत दामिनी की मृत्यु को समर्पित)


(04 जनवरी 2013)