ये शहर !
तुम्हारे क़रीब आने की
कोई वजह तो हो. . .
आदमी के कद से बड़ा
तुम्हारा कद
आख़िर एक खुदगर्ज़ शहर
और कैसा हो ?
सिर के ऊपर
डूबते सूरज की पृष्ठभूमि वाले आसमान की तरह
मौन, उदास, पराजित. . .
पैरों के नीचे
पैरों के निशान से
दबी हुई धरती. . .
आदमी से ज़्यादा
आदमी की परछाईयाँ,
आदमी से लम्बी
आदमी की परछाईयाँ. . .
और ख़ुद अपनी परछाई से
दूर. . . .बहुत दूर आदमी,
वेश्याओं की तरह -
आईने से दूर,
घर से दूर,
दुनिया के नक़्शे से दूर,
सिगरेटे और चौकलेट में खोया हुआ. . .
(15 मई 2011)