Sunday, 17 March 2013

बुरा जो देखन मैं चला. . . 

मैं शर्मिन्दा हूँ
अपने मर्द होने पर,
मैं शर्मिन्दा हूँ
मर्दानगी के अपने समूचे
इतिहास पर.
मैं शर्मिन्दा हूँ
ज़िन्दगी जीने के अपने तरीकों पर,
मैं शर्मिन्दा हूँ
अपने ख़ुश होने के तरीकों पर.

मैं शर्मिन्दा हूँ उस नज़रिए पर
जो मुझे विरासत में मिली है,
अपने घर से
अपने समाज से
और मर्दों की स्वाभाविक प्रवृत्तियों से

मैं शर्मिन्दा हूँ की मैं नहीं बचा सका
उस लड़के की लाज
जिसकी पैदाईश पर
कभी घरवालों को
नाज हुआ था

मैं शर्मिन्दा हूँ
अपनी इस खोज पर
कि लड़कियों की पैदाईश पर
कभी किसी बाप को उतनी ही बेफ़िक्री
क्यों नहीं होती ?

मैं शर्मिन्दा हूँ
कि मैंने वेश्याओं के चेहरों में
माँ का चेहरा नहीं मिलने दिया
कि अपने पाक-साफ़ बदन को
क़ैदखाना बना दिया. . .

मैं शर्मिन्दा हूँ
कि मेरे सारे पाप
वास्तविक हैं
क्योंकि मैं किसी कहानी का
कोई काल्पनिक पात्र नहीं हूँ.

(06 अप्रैल 2012)