Monday, 20 October 2014

सोनागाछी का 'छी '

तुम्हारे शहर में 
बस एक चीज़ थी 
जिसकी परछाई नहीं बनती थी 
कभी ज़मीन पर,
नीचे बहती नदी में 
पुल से छूट कर गिरना 
पुल की परछाई का 
हर बार ख़ुदकुशी ही लगी 
एक बार भी नहीं लगा
कि जिस पुल का कैंटलीवर 
पूरा शहर संभाल सकता था 
सिवाय अपनी परछाई के 
उसी पुल पर 
तुम भी तो खड़ी थी..... 

( 12 मई 2014 )

Friday, 10 January 2014

चूड़ियों वाला हाथ....  


माँ
बचपन में तुम्हारा मारना
उतना कभी नहीं खला
जितना अब
तुम्हारा
नहीं मारना खलता है.

मुझे याद है
तुम्हारा गुस्सा
जिसमें भूल जाती थी तुम
कलाई से चूड़ियाँ उतारना;
लेकिन चूड़ियाँ कभी नहीं भूलीं
तुम्हें सज़ा देना;
अक्सर, हर बार
तुम्हारी कलाई को
ज़ख़्मी करना
बच्चों को मारते हुए;

और मार खाते हुए
मेरा नन्हा ग़ुस्सा देखता
तुम्हारा
एक-एक कर
कमज़ोर चूड़ियों को
कलाई में ढूंढना,
और ख़ुद ही तोड़ना उन्हें
कुछ बुदबुदाते हुए
जैसे परवाह करते हुए
चूड़ियों की
कलाई से ज्यादा,
अपने ग़ुस्से से ज्यादा;

माँ
बहुत खलता है
अब
तुम्हारा
चूड़ियों से ज्यादा
मेरे बारे में सोचना……


(08 जनवरी 2014)