Sunday, 17 March 2013

बुरा जो देखन मैं चला. . . 

मैं शर्मिन्दा हूँ
अपने मर्द होने पर,
मैं शर्मिन्दा हूँ
मर्दानगी के अपने समूचे
इतिहास पर.
मैं शर्मिन्दा हूँ
ज़िन्दगी जीने के अपने तरीकों पर,
मैं शर्मिन्दा हूँ
अपने ख़ुश होने के तरीकों पर.

मैं शर्मिन्दा हूँ उस नज़रिए पर
जो मुझे विरासत में मिली है,
अपने घर से
अपने समाज से
और मर्दों की स्वाभाविक प्रवृत्तियों से

मैं शर्मिन्दा हूँ की मैं नहीं बचा सका
उस लड़के की लाज
जिसकी पैदाईश पर
कभी घरवालों को
नाज हुआ था

मैं शर्मिन्दा हूँ
अपनी इस खोज पर
कि लड़कियों की पैदाईश पर
कभी किसी बाप को उतनी ही बेफ़िक्री
क्यों नहीं होती ?

मैं शर्मिन्दा हूँ
कि मैंने वेश्याओं के चेहरों में
माँ का चेहरा नहीं मिलने दिया
कि अपने पाक-साफ़ बदन को
क़ैदखाना बना दिया. . .

मैं शर्मिन्दा हूँ
कि मेरे सारे पाप
वास्तविक हैं
क्योंकि मैं किसी कहानी का
कोई काल्पनिक पात्र नहीं हूँ.

(06 अप्रैल 2012)

Sunday, 3 February 2013

ये शहर !

तुम्हारे क़रीब आने की
कोई वजह तो हो. . .
आदमी के कद से बड़ा
तुम्हारा कद
आख़िर एक खुदगर्ज़ शहर
और कैसा हो ?

सिर के ऊपर
डूबते सूरज की पृष्ठभूमि वाले आसमान की तरह
मौन, उदास, पराजित. . .

पैरों के नीचे
पैरों के निशान से
दबी हुई धरती. . .

आदमी से ज़्यादा
आदमी की परछाईयाँ,
आदमी से लम्बी
आदमी की परछाईयाँ. . .
और ख़ुद अपनी परछाई से
दूर. . . .बहुत दूर आदमी,
वेश्याओं की तरह -
आईने से दूर,
घर से दूर,
दुनिया के नक़्शे से दूर,
सिगरेटे और चौकलेट में खोया हुआ. . .

(15 मई 2011)

Tuesday, 29 January 2013

 आधी आबादी 


तुम जो कुछ कहना चाहती थी
अब वही देश का संविधान होगा
तुम जितना रोना चाहती थी
अब वही देश का इतिहास होगा
तुम जिन ज़ख्मों से हार गयी
अब वही देश का नक्शा होगा
और यह देश मेरा होगा
चाहे इसका नाम भारत हो
या न हो;

इस देश की आज़ादी का
कोई राष्ट्रीय इतिहास नहीं होगा
क्योंकि इससे एक ग़लतफ़हमी पैदा होती है
कि आज़ादी राष्ट्रीय चीज़ है
जिस चीज़ के लिए
आधी से ज़्यादा आबादी अपनी लड़ाई में
अनवरत, अकेली और बेबस है
वह न तो राष्ट्रीय होगी
और न ऐतिहासिक;

सिर्फ़ दिल्ली में नहीं
इस देश की हर गली में औरतें होंगी
लड़कियों के झुण्ड के झुण्ड होंगे
उनका अपना एक चेहरा होगा
जो माथे की बिंदी से बड़ा होगा
उनकी अपनी एक इज्ज़त होगी
जो मूछों पर बैठे लोकतंत्र से बड़ी होगी
उनका अपना एक सपना होगा
जो बेटे पैदा करने से कहीं बड़ा होगा;

इस देश में
कानून की किताबों
और एक लड़की के कपड़ों के वजन में फ़र्क होगा
और यह फ़र्क उतना ही बड़ा और पवित्र होगा
जितनी एक जवान लड़की की रात होती है;

इस देश के मर्दों को
औरत में औरत को ढूँढना आता होगा
और जिसकी नज़र कमज़ोर होगी
उसके गले से पट्टा मैं खोलूँगा
और मैं बताऊंगा
की इंसान बनने की कोशिश में
मैंने लाखों साल लगाए हैं
सिर्फ़ अपनी उम्र नहीं. . .
बस, अब और नहीं. . . !

(दिवंगत दामिनी की मृत्यु को समर्पित)


(04 जनवरी 2013)

Monday, 24 September 2012

उड़ान 

कल रात 
बारिश के बाद 
समंदर में पानी भी बढ़ गया है 
और मेरी 
प्यास भी . . .

कल तक 
सिर्फ समंदर था गहरा 
और आसमान ऊँचा था 
अब तो मेरी प्यास भी है 
और उम्मीद भी कम नहीं . . .


(17 फ़रवरी 2010)

Tuesday, 13 March 2012

अ सुसाइड नोट 

अभी-अभी एक मुट्ठी से माँ की ऊँगली छूट गयी,
धुंए की भीड़ में और एक बच्चा खो गया.

एक पत्थर, एक ठोकर, लडखडाना. . .हाथ बढ़ाना,
माँ की ऊँगली का सिगरेट में बदल जाना. . .

तब से उंगलियो में सिगरेट जल रही है,
होठों से होकर सीने में ढल रही है. . .

पहली सिगरेट के पहले तक मैं भी बच्चा था,
हाथों में माँ की उंगलियो का गुच्छा था. . .

अब तक माँ के खून से बना था,
अब धुंए से बन रहा हूँ. . .

अफ़सोस अब बड़ा हो गया हूँ,
24 साल, 10 सिगरेट और कुछ कश का हो गया हूँ. . .

पिता के उपदेशों की उम्र 24 साल थी,
माँ की उम्मीदों की उम्र 24 साल थी,

एक माँ का बच्चा अब मर रहा है. . . .
माँ के खून में अब धुआं भर रहा है. . . .

(2008)
 

Monday, 5 March 2012

पुल 

उस गाँव
और इस शहर के बीच
मैं
एक पुल हूँ,
जिससे हर होली-दिवाली
तस्करी हो रही है
उम्मीदों की. . !

(25 फ़रवरी 2011)