Monday, 30 September 2013

क़ैद 


मेरी माँ में 
और एक वेश्या में 
कभी 
कोई फ़र्क़ नहीं था;

औरतें 
घरों में क़ैद हैं 
या फिर 
बाहर ! 

(२६ जनवरी २०१२)

Sunday, 11 August 2013

जवाब 


एक बहुत पेशेवर सवाल है - 
"आप क्या करते हैं ?"

इस सवाल के जवाब में 
यह कभी अपेक्षित नहीं होता 
कि आप हमेशा 
हर हाल में मुस्कुराते हैं; 
या दूसरों की ग़लतियों पर 
आप उन्हें अक्सर माफ़ कर देते हैं; 
या एक सिगरेट  की बजाए 
आप हमेशा दो चॉकलेट ख़रीदते हैं 
घर लौटते हुए; 
या आप इंतज़ार करते हैं शाम का 
जब घर पर इंतज़ार करेगी 
आपके बच्चों की माँ.… 

पूछने वाले का इससे 
कोई सरोकार नहीं होता 
कि ख़ुश रहने के लिए आप 
क्या-क्या करते हैं.… 

वह सिर्फ़ जानना चाहता है 
कि पैसे कमाने के लिए 
"आप क्या करते हैं ?"

(24 फ़रवरी 2010)

Wednesday, 31 July 2013

A TEA WITHOUT SUGAR

It happened one afternoon. . .

Someone was talking with rain
Down in the street that afternoon
When I was adding milk
In the bubbling water on the stove
“Is it really easy to think about a cup of tea?”
I thought as I tried to catch
My reflection in the bowl
And added some smashed ginger
When found no one in there;

I was thinking about tea-leaves
When I recognised the hand. . .
The hand tapping the door since ages
But still not willing to walk inside
It was him
Kissing the rain with every inch of his body
He entered that empty room
Full of avoidable things
And looked up into the mirror
The only place where he had never been alone. . . 

“Do you really like rain?”
I wanted to ask him
When he turned away
Holding the tea I offered him. . .
“Don’t you think about sugar?”
He asked after making few soundless sips
And for the first time ever
I thought it is always good
To make two cups of tea
If you are not sure
You are not waiting for someone. . !

(15 June 2013)

Thursday, 6 June 2013

ख़ानाबदोश 


आज की रात
मेरे होठों पर होठों के
निशान रहने दो

मेरी बाँहों में बाँहों का
तनाव रहने दो

मेरी ऊँगलियों में गेसुओं की
उलझन रहने दो

मेरी सांसों में तुम्हारी ख़ामोश
आहें रहने दो

मेरी आँखों में मजबूरी का
इतिहास रहने दो

एक पूरी सदी को एक
अधूरी रात रहने दो

मेरे भीतर तुम ख़ुद  को रहने दो,
आज की रात मुझमें
रात रहने दो !

(13 जून 2008)

Wednesday, 22 May 2013

स्वागत 


सावधान !
मेरी दुनिया में
सपनों से बाहर निकलना मना है
और किसी भी नर्म दिल के लिए
अनाधिकार प्रवेश वर्जित नहीं है .

वे वापस लौट जाएँ
जो इन्सान को चेहरे से पहचानते हैं;
यहाँ सबके चेहरे धुएँ से बने हैं,
जले हुए रिश्तों और
भस्म हो चुके विश्वास के धुएँ से . . .

इसलिए जो सच्चा अभिनय कर सकते हैं -
हँसने का,
रोने का,
मरने का,
और पूरी लापरवाही से ज़िम्मेदार बनने का,
उनका स्वागत है . . .

(30 नवम्बर 2006)

Wednesday, 17 April 2013

THE PERFECT SUBSTITUTE

Do not provide me with suggestions
On how to smoke cigarettes
As I've told you, I don't inhale-
It Never leaves me with regret.

And being inside a whorehouse
And talking about shares in a whore
When you advise me not to light
A half-used cigarette
You surprise me more and more

Being concerned just about my health
You are unaware of the hidden resemblance
Between a smoker of my kind
And a customer of your kind;

As I don't inhale a cigarette
It doesn't touch my lungs
The same as how it never bothers your soul
When you buy your share of a whore.

Or just think about the most perfect substitute
For an unfinished cigarette in the dustbin!
Can't you see the hovering all around us?
Can't you filter a simile from around us?

Every time you claim to finish a cigarette
You always find a 'filter' larger-than-before
Having your hold on it. . .
Having still smoke in it. . .

But it's no longer as pure
As it was a few puffs before,
Holding a cigarette by the filter
Have you ever imagined a whore?


(17 March 2013)

Sunday, 17 March 2013

बुरा जो देखन मैं चला. . . 

मैं शर्मिन्दा हूँ
अपने मर्द होने पर,
मैं शर्मिन्दा हूँ
मर्दानगी के अपने समूचे
इतिहास पर.
मैं शर्मिन्दा हूँ
ज़िन्दगी जीने के अपने तरीकों पर,
मैं शर्मिन्दा हूँ
अपने ख़ुश होने के तरीकों पर.

मैं शर्मिन्दा हूँ उस नज़रिए पर
जो मुझे विरासत में मिली है,
अपने घर से
अपने समाज से
और मर्दों की स्वाभाविक प्रवृत्तियों से

मैं शर्मिन्दा हूँ की मैं नहीं बचा सका
उस लड़के की लाज
जिसकी पैदाईश पर
कभी घरवालों को
नाज हुआ था

मैं शर्मिन्दा हूँ
अपनी इस खोज पर
कि लड़कियों की पैदाईश पर
कभी किसी बाप को उतनी ही बेफ़िक्री
क्यों नहीं होती ?

मैं शर्मिन्दा हूँ
कि मैंने वेश्याओं के चेहरों में
माँ का चेहरा नहीं मिलने दिया
कि अपने पाक-साफ़ बदन को
क़ैदखाना बना दिया. . .

मैं शर्मिन्दा हूँ
कि मेरे सारे पाप
वास्तविक हैं
क्योंकि मैं किसी कहानी का
कोई काल्पनिक पात्र नहीं हूँ.

(06 अप्रैल 2012)

Sunday, 3 February 2013

ये शहर !

तुम्हारे क़रीब आने की
कोई वजह तो हो. . .
आदमी के कद से बड़ा
तुम्हारा कद
आख़िर एक खुदगर्ज़ शहर
और कैसा हो ?

सिर के ऊपर
डूबते सूरज की पृष्ठभूमि वाले आसमान की तरह
मौन, उदास, पराजित. . .

पैरों के नीचे
पैरों के निशान से
दबी हुई धरती. . .

आदमी से ज़्यादा
आदमी की परछाईयाँ,
आदमी से लम्बी
आदमी की परछाईयाँ. . .
और ख़ुद अपनी परछाई से
दूर. . . .बहुत दूर आदमी,
वेश्याओं की तरह -
आईने से दूर,
घर से दूर,
दुनिया के नक़्शे से दूर,
सिगरेटे और चौकलेट में खोया हुआ. . .

(15 मई 2011)

Tuesday, 29 January 2013

 आधी आबादी 


तुम जो कुछ कहना चाहती थी
अब वही देश का संविधान होगा
तुम जितना रोना चाहती थी
अब वही देश का इतिहास होगा
तुम जिन ज़ख्मों से हार गयी
अब वही देश का नक्शा होगा
और यह देश मेरा होगा
चाहे इसका नाम भारत हो
या न हो;

इस देश की आज़ादी का
कोई राष्ट्रीय इतिहास नहीं होगा
क्योंकि इससे एक ग़लतफ़हमी पैदा होती है
कि आज़ादी राष्ट्रीय चीज़ है
जिस चीज़ के लिए
आधी से ज़्यादा आबादी अपनी लड़ाई में
अनवरत, अकेली और बेबस है
वह न तो राष्ट्रीय होगी
और न ऐतिहासिक;

सिर्फ़ दिल्ली में नहीं
इस देश की हर गली में औरतें होंगी
लड़कियों के झुण्ड के झुण्ड होंगे
उनका अपना एक चेहरा होगा
जो माथे की बिंदी से बड़ा होगा
उनकी अपनी एक इज्ज़त होगी
जो मूछों पर बैठे लोकतंत्र से बड़ी होगी
उनका अपना एक सपना होगा
जो बेटे पैदा करने से कहीं बड़ा होगा;

इस देश में
कानून की किताबों
और एक लड़की के कपड़ों के वजन में फ़र्क होगा
और यह फ़र्क उतना ही बड़ा और पवित्र होगा
जितनी एक जवान लड़की की रात होती है;

इस देश के मर्दों को
औरत में औरत को ढूँढना आता होगा
और जिसकी नज़र कमज़ोर होगी
उसके गले से पट्टा मैं खोलूँगा
और मैं बताऊंगा
की इंसान बनने की कोशिश में
मैंने लाखों साल लगाए हैं
सिर्फ़ अपनी उम्र नहीं. . .
बस, अब और नहीं. . . !

(दिवंगत दामिनी की मृत्यु को समर्पित)


(04 जनवरी 2013)