अजनबी खुशबूओं वाली तुम्हारी यह उम्र मेरे नथुनें अब नहीं पहचानते ! बालों में उलझी ख़ुशबू शैम्पू की, होठों से लिपटा लिपस्टिक का गंध, आँखों से उठता काला धुआँ काजल का और पोर-पोर बंद चेहरे का किसी क्रीम की सात परतों से . . . ऊँगलियों से पैरों तक क़ैद है तुम्हारी ख़ुशबू किसी सस्ते नेलपॉलिश के ठण्डे जमे हुए रंग में; ऐसे में ढूँढ़ता हूँ तुम्हारी ख़ुशबू किसी पुराने एलबम से उठती पहली सिगरेट से पहले वाली तुम्हारी खाँसी में . . .